नई दिल्ली। महाशिवरात्रि केवल व्रत और रुद्राभिषेक का पर्व नहीं है, बल्कि यह उस अद्वितीय प्रेम, त्याग और तपस्या का प्रतीक है, जिसके बल पर माता पार्वती ने महादेव को पति रूप में प्राप्त किया। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित एक कथा बताती है कि विवाह से पहले भगवान शिव ने स्वयं माता पार्वती की भक्ति और प्रेम की अंतिम परीक्षा ली थी। इस दौरान महादेव ने ऐसा रूप धारण किया, जिससे पार्वती को यह साबित करना पड़ा कि उनका प्रेम केवल शिव के ऐश्वर्य से नहीं, बल्कि उनके तपस्वी और अघोर स्वरूप से भी जुड़ा है।
कठोर तपस्या से डगमगा उठे तीनों लोक
शिव पुराण के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठिन तपस्या की। उनकी साधना इतनी प्रबल थी कि देव, दानव और ऋषि-मुनि सभी चकित हो गए। कहा जाता है कि पार्वती की तपस्या से तीनों लोकों में हलचल मच गई। महादेव पार्वती की भक्ति से प्रसन्न तो थे, लेकिन वे यह भी परखना चाहते थे कि पार्वती उन्हें हर रूप में स्वीकार करने को तैयार हैं या नहीं।
वृद्ध ब्राह्मण के वेश में शिव की परीक्षा
तपस्या के अंतिम चरण में भगवान शिव ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उस स्थान पर पहुंचे, जहां माता पार्वती साधना कर रही थीं। ब्राह्मण ने उनसे तपस्या का कारण पूछा। जब पार्वती ने शिव से विवाह की इच्छा प्रकट की, तो ब्राह्मण हंस पड़ा और भगवान शिव की निंदा करने लगा।
श्मशानवासी शिव की निंदा
वेशधारी ब्राह्मण ने कहा कि शिव भस्मधारी हैं, श्मशान में वास करते हैं, गले में सांप धारण करते हैं और उनका न कोई कुल है, न घर। उसने पार्वती को समझाने की कोशिश की कि वे किसी सुंदर राजकुमार या देवराज इंद्र से विवाह कर लें, क्योंकि शिव के साथ जीवन केवल कष्टों से भरा होगा।
पार्वती का अडिग संकल्प बना प्रेम की विजय
अपने आराध्य की निंदा सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो उठीं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिव ही उनके लिए पूर्ण सत्य हैं। यदि उन्हें शिव नहीं मिले, तो वे जीवन त्याग देंगी, लेकिन किसी अन्य पुरुष का विचार भी उनके मन में नहीं आएगा। पार्वती का यह अडिग विश्वास और समर्पण ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति बना।
असली स्वरूप में प्रकट हुए महादेव
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जैसे ही पार्वती ने ब्राह्मण को वहां से जाने को कहा, उसी क्षण भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। माता पार्वती के अटूट प्रेम और विश्वास से भावविभोर होकर महादेव ने उन्हें उसी क्षण अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लिया। यही कारण है कि महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का पर्व माना जाता है।
